Poem | Ramshankar Vidrohi ( Translated by Dibyajyoti Sarma)

'Satire Has Many Faces' by Anil Karanjai

I am your poet


I, Simon
am standing in the dock of justice.
Let men and nature be my witnesses!

I am speaking from the last stair of the pond in Mohenjo-Daro
where lies the blazing corpse of a woman
where float numerous human bones.

You would find this blazing corpse even in Babylonia.
You would find scattered human bones even in Mesopotamia.
I wonder, and wonder constantly why must
the foundation of an ancient civilization
begin with a woman’s blazing corpse and human bones.
Which continues
From the rocks of Scythia to the fields of Bengal
and from the wilderness of Samaná to the forests of Kanha.


This woman could be a mother,
a sister,
a wife,
 a daughter.

I tell you, get out of my sight.
My blood boils, my heart singes, my skin sears.
They have killed my mother, my sister, my wife, my daughter.
My female ancestors wail in the sky.

I could have banged my head against the blazing corpse of this woman
and given up my life
if I did not have a daughter, and she tells me:
Papa, you worry about us girls for nothing.
We are just firewood born to light the kitchen hearth.

And yet these scattered bones could belong to
Roman slaves or the weavers from Bengal
or the ultra-modern children from Vietnam, Palestine, Iraq.

British or Roman, or the brand-new American,
an empire is an empire, which has but just one task
to scatter human bones
in mountains, plateaus and fields, in rivers and on seashores.

It claims to define history in three sentences:
Look, we have lit up the world.
Look, we have scorched the earth.
Look, we have scattered human bones everywhere.

But I am Spartacus’s descendent, I have his resolve.
Go tell Caesar, we will gather
all the slaves of the world and one day together
we will enter Rome.

No, we are not going anywhere
because at this very moment,
as I read my poem to you
the Latin American worker is
digging the grave of the Great Empire and the
Indian worker is filling the burrows of its pet rats
with water.

The fire of loathing that flames from Asia to Africa
cannot be doused, my friend!
because this fire is fed by the blazing corpse of a woman
because this fire is fed by the human bones scattered on earth.


A woman was killed in history for the first time
by her son
at the behest of his father.
Jamadagni says, Parasuram, I tell you, go kill your mother
and Parasuram obeys.
This is how the son comes to be his father’s.
This is how patriarchy starts.

This is how fathers start killing their sons.
Jahnavi  told her husband, go drown my children in the Ganges
and Shantanu, the king, obeyed

But Shantanu couldn’t be Jhanvi’s
because the king belongs to no one
because wealth belongs to no one
because religion belongs to no one.

Yet, everything belongs to the king
the cow, the Ganges, the Gita and the Gayatri
and god makes sure the king’s horses
have enough grass to chew upon .

He was a nice fellow, this god, devoted to the king
it’s a pity he’s gone, died a long time ago.
The king did not even give him a shroud or two square-feet of land
for burial
no one knows where he is buried.

Yet, god died in the end and it was a
historic event, historians maintain.
Historians also maintain  that even the king died and
the queen too and their son as well. The king died in combat,
the queen in the kitchen and the prince while cramming his notes.

The wealth granted by the king remained and like talk, it proliferated.

Again, we return to the foundations  of all civilizations and
find the blazing corpse of a woman and scattered bones.


This body did not burn by itself; someone set it on fire.
These bones are not just strewn around; someone scattered them.
This fire did not flicker on its own; someone lit it up.
This war did not begin spontaneously; someone started it.

Even this poem is not just transcribed, it was written down.
and when a poem is written down, a fire blazes.

I ask you, my people, rescue me from this fire.

Rescue me from this fire, my friends from the East
you, whose bountiful fields were tilled with swords
whose harvest was crushed under the wheels of  chariots.

Rescue me from this fire, my friends from the West
you, whose women were sold in the markets
whose children were fed into chimney fires.

Rescue me from this fire, my friends from the North
you, whose ancestors were forced to carry mountains
which were then broken on their backs.

Rescue me from this fire, my friends from faraway South
you, whose settlements were burnt down in forest fires,
whose boats were drowned in the bottomless seas.

You, all of you, whose blood and sweat
built pyramids, minarets, walls,
deliver me.

Deliver me to deliver the woman whose corpse lies
on the last stair of the pond in Mohenjo-Daro.
Deliver me to deliver the people whose bones float in the lake.

Save me to save your ancestors.
Save me to save your children.

Deliver me!
I am your poet.

मैं तुम्हारा कवि हूं।


मैं साइमन,
न्याय के कटघरे में खड़ा हूं,
प्रकृति और मनुष्य मेरी गवाही दें!
मैं वहां से बोल रहा हूं
जहां मोहनजोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी है,
जिस पर एक औरत की जली हुई लाश पड़ी है
और तालाब में इंसानों की हड्डियां बिखरी पड़ी हैं।
इसी तरह एक औरत की जली हुई लाश 
आपको बेबीलोनिया में भी मिल जाएगी,
और इसी तरह इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां 
मेसोपोटामिया में भी।
मैं सोचता हूं और बारहा सोचता हूं
कि आखिर क्या बात है कि 
प्राचीन सभ्यताओं के मुहाने पर 
एक औरत की जली हुई लाश मिलती है
और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां मिलती हैं
जिनका सिलसिला
सीथिया की चट्टानों से लेकर बंगाल के मैदानों तक
और सवाना के जंगलों से लेकर कान्हा के वनों तक चला जाता है।


एक औरत जो मां हो सकती है,
बहिन हो सकती है,
बीवी हो सकती है,
बेटी हो सकती है, 
मैं कहता हूं
तुम हट जाओ मेरे सामने से,
मेरा खून कलकला रहा है,
मेरा कलेजा सुलग रहा है,
मेरी देह जल रही है,
मेरी मां को, मेरी बहिन को, मेरी बीवी को
मेरी बेटी को मारा गया है,
मेरी पुरखिनें आसमान में आर्तनाद कर रही हैं।
मैं इस औरत की जली हुई लाश पर...
सिर पटक कर जान दे देता अगर
मेरे एक बेटी न होती तो...
और बेटी है,
कि कहती है
कि पापा तुम बेवजह ही हम
लड़कियों के बारे में इतने भावुक होते हो!
हम लड़कियां तो लकडि़यां होती हैं
जो बड़ी होने पर चूल्हे में लगा दी जाती हैं।

और ये इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां
रोमन गुलामों की भी हो सकती हैं
और बंगाल के जुलाहों की भी,
या अतिआधुनिक वियतनामी, फिलिस्तीनी, इराकी
बच्चों की भी।

साम्राज्य आखिर साम्राज्य ही होता है,
चाहे वो रोमन साम्राज्य हो,
चाहे वो ब्रिटिश साम्राज्य हो,
या अतिआधुनिक अमरीकी साम्राज्य।
जिसका एक ही काम है कि
पहाड़ों पर, पठारों पर,
नदी किनारे, सागर तीरे,
मैदानों में, इंसानों की हड्डियां बिखेर देना।
जो इतिहास को तीन वाक्यों में
पूरा करने का दावा पेश करता है-
कि हमने धरती पर शोले भड़का दिए, 
कि हमने धरती में शरारे भर दिए, 
कि हमने धरती पर इंसानों की हड्डियां बिखेर दीं।

लेकिन मैं
स्पार्टकस का वंशज,
स्पार्टकस की प्रतिज्ञाआंे के साथ जीता हूं-
कि जाओ कह दो सीनेट से-
कि हम सारी दुनिया के गुलामों को इकट्ठा करेंगे,
और एक दिन रोम आएंगे जरूर।

लेकिन हम कहीं नहीं जाएंगे,
क्योंकि ठीक इसी समय जब मैं 
ये कविता आपको सुना रहा हूं,
लातिन अमरीकी मजदूर
महान साम्राज्य के लिए कब्र खोद रहा है
और भारतीय मजदूर उसके 
पालतू चूहों के बिलों में पानी भर रहा है।
एशिया से लेकर अफ्रीका तक
घृणा की जो आग लगी है
वो आग बुझ नहीं सकती है दोस्त!
क्योंकि वो आग
एक औरत की जली हुई लाश की आग है,
वह आग इंसानों की बिखरी हुई हड्डियों की आग है।


इतिहास में पहली स्त्री हत्या
उसके बेटे ने अपने बाप के कहने पर की।
जमदग्नि ने कहा कि ओ परशुराम!
मैं तुमसे कहता हूं कि अपनी मां का वध कर दो,
और परशुराम ने कर दिया।
इस तरह से पुत्र पिता का हुआ
और पितृसत्ता आई।
तब पिता ने अपने पुत्रों को मारा।
जाह्नवी ने अपने पति से कहा
कि मैं तुमसे कहती हूं कि
मेरी संतानों को मुझमें डुबो दो,
और राजा शांतनु ने अपनी संतानों को 
गंगा में डुबो दिया।
लेकिन शांतनु जाह्नवी का नहीं हुआ,
क्योंकि राजा किसी का नहीं होता।
लक्ष्मी किसी की नहीं होती।
धर्म किसी का नहीं होता।
लेकिन सब राजा के होते हैं,
गाय भी, गंगा भी, गीता भी और गायत्री भी।

और ईश्वर तो ख़ैर, राजा के घोड़ों को
घास ही छीलता रहा,
बड़ा नेक था बेचारा ईश्वर,
राजा का स्वामिभक्त!
पर अफसोस है कि अब नहीं रहा,
बहुत दिन हुए मर गया।
और जब मरा तो राजा ने उसे कफ़न भी नहीं दिया,
दफन के लिए दो गज़ जमीन भी नहीं दी।
किसी को नहीं पता है कि ईश्वर को कहां दफ़नाया गया।
ख़ैर, ईश्वर मरा अंततोगत्वा,
और उसका मरना ऐतिहासिक सिद्ध हुआ,
ऐसा इतिहासकारों का मत है।
इतिहासकारों का मत ये भी है 
कि राजा भी मरा,
उसकी रानी भी मरी,
और उसका बेटा भी मर गया।
राजा लड़ाई में मर गया,
रानी कढ़ाई में मर गई,
और बेटा, कहते हैं कि पढ़ाई में मर गया।
लेकिन राजा का दिया हुआ धन रहा,
धन, वचन हुआ और बढ़ता गया।

और फिर वही बात!
कि हर सभ्यता के मुहाने पर एक औरत की
जली हुई लाश,
और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां।


ये लाश जली नहीं है, जलाई गयी है,
ये हड्डियां बिखरी नहीं हैं, बिखेरी गयी हैं,
ये आग लगी नहीं है, लगाई गयी है,
ये लड़ाई छिड़ी नहीं है, छेड़ी गई है,
लेकिन कविता भी लिखी नहीं है, लिखी गई है,
और जब कविता लिखी जाती है, 
तो आग भड़क जाती है।

मैं कहता हूं तुम मुझे इस आग से बचाओ मेरे लोगों!
तुम मेरे पूरब के लोगों, मुझे इस आग से बचाओ!
जिनके सुंदर खेतों को तलवार की नोकों से जोता गया,
जिनकी फसलों को रथों के चक्कों तले रौंदा गया।
तुम पश्चिम के लोगों, मुझे इस आग से बचाओ!
जिनकी स्त्रियों को बाजारों में बेचा गया,
जिनके बच्चों को चिमनियों में झोंका गया।
तुम उत्तर के लोगों, मुझे इस आग को बचाओ!
जिनके पुरखों की पीठ पर पहाड़ लाद कर तोड़ा गया
तुम सुदूर दक्षिण के लोगों मुझे इस आग से बचओ
जिनकी बस्तियों को दावाग्नि में झोंका गया,
जिनकी नावों को अतल जलराशियों में डुबोया गया।
तुम वे सारे लोग मिलकर मुझे बचाओ-
जिसके खून के गारे से
पिरामिड बने, मीनारंे बनीं, दीवारें बनीं,
क्योंकि मुझको बचाना उस औरत को बचाना है,
जिसकी लाश मोहनजोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी पर 
पड़ी है।
मुझको बचाना उन इंसानों को बचाना है,
जिनकी हड्डियां तालाब में बिखरी पड़ी हंै।
मुझको बचाना अपने पुरखों को बचाना है,
मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है,
तुम मुझे बचाओ!
मैं तुम्हारा कवि हूं।

Source for the original version of the poem in Hindi : Vidrohi

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