4/21/19

TSC Philosophy | हिन्दू : एक गैर राजनैतिक परिभाषा | Part 3 | Tarun Bisht

Vedic Goddess Usha, PC: Pinterest



आश्रम से प्रारंभिक गोत्र गठबंधन तक व त्रिमूर्ति की स्थापना

वेदों को एक सैनिक गठबंधन के साहित्य के तौर पर देख सकते है । काफी इतिहासकार वेदों को हड़प्पा के अंत से भी जोड़ते हैं । ऋग्वेद की 53वि स्तुति के 8वे श्लोक  में वक्र के 99  गण ढहने का भी जिक्र है जिसे ज्यादातर  इतिहासकार हड्डपा के नगरों से जोड़ते है ।

 ऋग्वेद में सात आश्रमों का गठबंधन बताया गया है। इनमें आर्य ही नहीं गैर आर्य आश्रम भी शामिल थे। वेदों, उपनिषद और पुराणों को देखा जाए तो एक कहानी मिलती है जो कहती है कि सिंधु और सरस्वती के बीच तीन आर्य आश्रम थे जिन में दो गुट बन गए: एक विश्वामित्र,और  जमदग्नि का और दूसरा वशिष्ठ का जिसका मुख्य कारण गैर आर्यो से सैनिक गुटबंदी था।

विश्वामित्र ने अपने नाती परशुराम को एकेश्वरवादियों (शिवा) के आश्रम में पढ़ाई के लिए भेजा । इस बीच आर्यव्रत में वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच युद्ध हुआ जिसमें विश्वामित्र की विजय हुई पर आर्यव्रत कमजोर पड़ गया क्यूंकि आपसी गृहयुद्ध ने काफी हानि कर दी थी। इसी समय परशुराम अपनी शिक्षा पूरी कर आर्यव्रत लौटे। लौटते ही आर्यव्रत से दास प्रथा ख़त्म कर गैर आर्यो को आर्यो में सम्मलित कर दिया । उन्हें तीन आश्रमों की सत्ता हासिल हुई व उन्होंने दो अंगिरस के शिष्यों गौतम और भारद्वाज जो एकेश्वरवादी (शैविक) थे  व दो प्रकृतिवादीओ अत्रि और कश्यप के आश्रमों से भी घटबन्धन किआ और उत्तर पश्चिम भारतीय उपमहा दीप में इस गठबंधन ने एक महान राष्ट्र की स्थापना की व परशुराम ने भरत का राज्याभिषेक किया । ये राष्ट्र भारतवर्ष पश्चिम उत्तर  में  सिंध तक (अभी के पाकिस्तान जिसे सात नदिओं वाले देश के तौर पर कहा गया है) था; दक्षिण में इस की  सीमा  वैदिक साहित्य में अनूप नगरी ( लोथल) तक बताई गई है (नर्मदा नदी की शुरआत) ।

 शुरुआती गठबंधन का मुख्य कारण एक प्रबल शक्तिशाली दुश्मन साहस्त्रार्जुन था पर तीन दर्शनों व सात आश्रमों का ये समूह प्रथम सात गोत्रो के रूप में प्रचलित हुआ । दक्षिण में दक्षिण राज्य व पूर्व में तक्षिला गणराज्य के अलावा  भी उनके समक्ष शक्तिया मैजूद थी जिन से सीधा टकराव संभव नहीं था, इन सात आश्रमों के लिए भी ।

आगे चल कर ऋग वेद की अंतिम स्तुतिओ में एक निर्णायक युद्ध में जब अश्विन कुमारो ने नेतृत्व संभाला तो आयुर्वेद व अपने चिकित्साए ज्ञान की वजह से हारी सेना को फिर से खड़ा कर जीत दिलवाई ।  इसी जीत की वजह से दूसरे वेद अर्थवेद में आर्युवेद का ज्ञान संरक्षित करने की वजह बनी  होगी व इस चिकित्सा पद्वति व औषधि ज्ञान को सभी के लिए संरक्षित किया गया ।

औषधि व चिकित्सा ज्ञान के अलावा सभी आश्रमों में दूसरे दर्शनों को पढ़ाना भी शामिल किया गया जिस से सातों आश्रमों में सामंजस्य बनाए रखा जा सके व आपसी एकता बनी रह सके ।  आपस के प्रतीक चिह्न के रूप में आश्रमों व मंदिरो में भी तीनो दर्शनों के चिह्न रूप में त्रिमूर्ति की स्थापना की गईं। युद्ध के बाद यज्ञ किया जाता था जिसमें युद्ध का मुख्य सेना नायक लूट के धन व पशुओं का बँटवारा सातो आश्रमों में करता था। यज्ञ के उपरांत सेना नायको की स्तुति गायी जाती थी जो आम तौर पर अतिश्योक्ति होती थी । आगे चल कर वीरगाथा काल में भी राज कवियों द्वारा इस तरह की अतिश्योक्ति साहित्य में पायी जाती रही है।

 ऋग्वेद में देवी उषा का भी जिक्र है जो कि  सूर्य पुत्री बताई गई हैं। उनका विवाह अलग अलग वेदों की स्तुतिओ में अलग अलग सेनानायको से दिखाया गया है।  ऋग्वेद की 119 वि स्तुति के पाचवें श्लोक में देवी उषा ने दोनों अश्विन कुमारों से विवाह किया। शायद देवी उषा किसी मातृ- प्रधान समाज की प्रतिनिधित्व करती थीं जिनका वंश शायद स्त्री पक्ष से माना जाता रहा होगा व स्वयंवर या पूर्ण स्वतंत्रता  से राजकुमारी अपने पति का चुनाव करती थी। जरूर ये स्वम्वर या शादी शक्तिमूलक गठबंधन पर केंद्रित थी । देवी उषा का पति सूर्य कहलाता था जैसा की ऋग्वेद  की 123 वि स्तुति के 10 वे श्लोक से पता चलता है । किसी भी आश्रम के नेतृत्व-कर्ता के लिए देवी उषा को पत्नी रूप से प्राप्त करना सामरिक दृष्टि से उसे अति शक्तिशाली बना देता होगा। एक प्रमुख ग्रन्थ महाभारत में द्रोपदी का भी उल्लेख मिला है व भारत के उत्तराखंड के जोनसर बावर व नेपाल में  पहले इस तरह की भाइयों से शादी की प्रथाएं  मौजूद रही है जिसमें एक स्त्री से सभी भाइयों  का विवाह होता था।


यजुर्वेद में विष्णु का इस गठबंधन में आगमन दिखाया गया है । विष्णु का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद की 22वी स्तुति के 16 वे श्लोक [1] में लिया गया है  यहाँ पर उन्हें इंद्र के मित्र के तौर पर दिखाया गया है । ऋगवेद की 88 स्तुति के दूसरे श्लोक में विष्णु को सावले वर्ण का बोला गया व वेदों में विष्णु का आना यजुर्वेद के पञ्चमोध्यायः के 28 वे शलोके में हिरण्यगर्भा  अनुष्ठान के माध्यम से दिखाया गया है । बाद में महाभारत के युद्ध में विष्णु (कृष्ण) को इंद्र को हरा इंद्र पूजा का अंत करते दिखाया गया है शायद इसी जगह वैष्णवों द्वारा आर्य जातिओ को अपने अंदर मिला लिया गया था।

उत्तर भारतीय सात गोत्रो से अलग उन्हें सांवले वर्ण का कहा गया मगर उत्तर भारत के इस गठबंधन ने दक्षिण के श्याम वर्ण के दुश्मन राष्ट्र के लोगो के प्रति एक नफरत का भाव फैलाया जिस के प्रमाण के तौर पर हमें वाल्मिकी रामायण मिलती है। राखीगड़ी की हड़प्पा सभ्यता की 2018 एंथ्रोपोलॉजी रिपोर्ट भी इस बात को सत्यापित करती है कि उत्तरपश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप में गोरे वर्ण के लोग निवास करते थे व बाकि भारतीय उपमहाद्वीप में काले व सावले वर्ण के लोग भी मौजूद थे । नए वैदिक गठबंधन ने पुराने गणराज्यों की जगह ले ली पर स्थानीय तौर पर ये सिर्फ एक सैनिक गठबंधन ही था जो अपनी लगातार जीत व लूटपाट की वजह से शक्तिशाली होता जा रहा था ।


[1] Rig Veda, tr. by Ralph T.H. Griffith ऋग्वेदे की २२वी स्तुति के 16 वे श्लोक https://www.sacred-texts.com/hin/rigveda/rv01022.htm
Rigved - ऋग्वेद संहिता हिंदी by Sanatan ऋग्वेदे की २२वी स्तुति के 16 वे श्लोक https://archive.org/details/RigvedInHindi/page/n23

4/19/19

TSC Philosophy | हिन्दू : एक गैर राजनैतिक परिभाषा | Part 2 | Tarun Bisht

Painting by Henry Ambrose Oldfield, 1853

एकेश्वरवाद (शैविक) दर्शन

भारतीय इतिहास और हिन्दू संस्कृति पर शैविकों का बहुत अधिक प्रभाव रहा है। ये विचार अलग अलग आश्रमों की अलग अलग व्याख्या के माध्यम से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर मौजूद थे। हर आश्रम अलग अपनी संस्कृति व मान्यताओं के साथ दर्शन के आधार पर आपस में जुड़ा हुआ था। शैविक ईश्वरी मत भारतीय इतिहास के सब से प्राचीन ईश्वरी मतों में से एक है । अन्य देवी पूजकों ने भी इन्हे पितृ रूप में स्वीकार किया जिन की वजह से 112 शैविक आश्रम व जीवन शैलियों की उत्पत्ति हुई। इनमें से 52 सत्ताधारी देवियों या पार्वती के 52 रूपों के तौर पर पूजी जाती हैं। देवी पूजक शाक्त कहलाए। ये सभी देवी व शिव रूप में दर्शन के आधार पर एकजुट थे व कुलदेवी व कुल देवता के तौर पर अलग अलग समुदाय द्वारा पूजे जाते थे। एक दर्शन होने के बावजूद ये स्थानीय राजनितिक व भौगालिक स्तिथि से काफी प्रभावित रहे जिस की वजह से सांस्कृतिक , न्यायिक व आर्थिक विविधता बनी रही । उत्तरी-पश्चिमी ,उत्तरी-पूर्वी व दक्षिणी शैविक साहित्य में ये अंतर देखने को मिलता है। शैविक का ज्यादतर साहित्य दक्षिण में ह्यमंस (HYMNS) तमिल साहित्य से[1], कश्मीर और शिवालिक से अभिनव गुप्त[2] और बंगाल और असम से काली[3] और अन्य साहित्य उपलब्ध है। उन का उल्लेख हमें वैष्णव, बुद्धिस्ट व जैन धर्म के साहित्य में भी मिलता है जिन में शिव को अलग अलग ईशवरी मतों ने विचार के रूप में स्वीकार किया । हिन्दू संस्कृति में सबसे बड़े अद्वैत देवता के रूप में शिव प्रचलित है व मोहनजोदड़ों में भी प्रतीक चिह्नों के तौर पर पशुपति रूप में दिखते हैं।
शैविक धार्मिक मत का मूल सिद्धांत समानता है - ये चिह्नों व कहानियों के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति करते हैं। सम्पूर्ण सृष्टि को शिव के तौर पर देखते हैं। इस को समझने की लिए कन्या कुमारी की कहानी काफी प्रचलित है जिसमें शिव के जन्म की कथा को बताया गया है।
ओमकारा (शिव का पहला नाम ) - अग्नि से एक ध्वनि उत्पन्न हुई (ॐ) जब उस ध्वनि ने खुद को रूप दिए तो शिव था " स्वयंशंभु "(शिव का दूसरा नाम)
जब शिव ने रूप लिया तो वहा दो तरह की शक्तिया थी जो एक मूल होते हुए भी एक दूसरे के विपरीत थी और एक दूसरे से टकरा रही थी "अर्धनारीश्वर" (शिव का तीसरा नाम) और इस टकराव से सृजन हो रहा था "शिवलिंग" सृजन का प्रतीक चिह्न।
शुरुआती दौर में शैविक ईश्वरी मत को तीन हिस्सों में बाँट कर देखना जरूरी है, दर्शन व सांस्कृतिक तौर पर ये एक दर्शन में जरूर विश्वास करते थे परन्तु स्थानीय भूगोलिक व राजनैतिक गठबंधनों का प्रभाव इन में निरन्तर रहता जो की अभिनव गुप्त के कश्मरी शेविकिसम को व बंगाल के काली लिटरेचर और दक्षिण के तमिल ह्यम से अलग करता है।
हमें इतिहास में अलग अलग भारतीय ईश्वरी मतों के साहित्य में इस के प्रमाण मिलते है। उदाहरण के तौर पर राम रावण युद्ध शैविक मत वालों व वैदिक गोत्र घटबन्धन वालो के बीच संघर्ष दिखाता है। बौद्ध धर्म में भी सिद्धरामा पुण्डरीका सूत्रा व जैनिओ में ऋषभ अवतार में शिव साहित्य मिलता है जो कि दक्षिण के शैविकइस्म से ज्यादा मिलता है।
शैव परंपरा के अनुसार शिव सबसे बड़ा अद्वैत ईश्वर कहलाता है जो कि अन्य अद्वैत ईश्वरों की तरह कभी नहीं कहता कि मेरी पूजा करो न ही शिव की पूजा करने का कोई विधि विधान ही है । जो बताता है शिव इक स्मिरीति चिन्ह के रूप में चिन्हित किया जाता था; शिव की भक्ति परंपरा बहुत बाद में शुरू हुई, शुरुआत में अद्वैत में देवता को पूजने का प्रचलन नहीं रहा था ।
एकेश्वरवादी या (शैविक) वादियों के अनुसार - मै एक तथ्य हूँ जिस की अपनी स्थिति है, हम अपनी स्थिति को अलग अलग, समूहों से,खुद को,अपने सत्य के माध्यम से जोड़ते है; हम खुद को जिस भी संरचना के साथ जोड़ते है हम वो हो जाते है उदाहरण के लिए—
 मै तथ्य
 मै परिवार
 मै समाज
 मै पंथ
 मै पृथ्वी
 मै अंतरिक्ष
 मै शिव
इन की आर्थिक नीति हड़प्पा से जोड़ कर देख सकते है क्योंकि वहां से पशुपति सील पायी गई जो हमें कश्मीरी शैविक दर्शन में भी मिलती है। राखीगड़ी में गणेश की कुशान युग [4] सील भी मिली है | ये नगर शायद युद्ध के समय ही एकृतित होते होंगे बाकि समय ये अलग अलग स्वतंत्र रूप से होते होंगे | मार्कोपोलो के अनुसार राजा अलग ऊंचे आसान में नहीं सभी के साथ जमीं पर बैठता था जो शैविक दर्शन के समानता के भाव को दर्शाती है। दक्षिण राज्य व्यवस्था  से भी इन की तुलना कर सकते हैं। इन में ही शायद स्त्रीप्रधान राष्ट्र भी शामिल थे जिनका विवरण हमें देवी उषा के रूप में वेदों में मिलता है। गणराज्य व्यवस्था भी प्रचलित थी; मरुतों को गणों का स्वामी व गणों की संख्या एक जगह 63 बताई गई है।
मरुतों को ऋग वेद में रूद्र की संतान कहा गया है जो गणराज्यो के नायक थे[5] | सभी दर्शन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अलग अलग आश्रमों के माध्यम से विद्मान थे |


द्वैत इंद्र या वैष्णव दर्शन

शुरुआती साहित्य में द्वैत दर्शन के भारतीय उपमहाद्वीप पर दो बड़े उदहारण पाए गए, इनमे एक तरफ आर्य है जो की मध्य एशिया से आ कर सिंधु व सरस्वती के बीच बसे वही दूसरी ओर आज के उत्तेर प्रदेश व मध्य प्रदेश के अधिकतम हिस्सों में वैष्णव राज्य स्थापित था दोनों दर्शन ही राजा मनु व जलप्रलय की अवधारणा को मानते थे  आर्यो ओर वैष्णवों दोनों में नेतृत्वकर्ता को पूजा जाता था, इनका मानना था की नेतृत्वकर्ता ही जब समाज की आर्थिक दैनिक सामाजिक तौर पर चीजों का निर्धारण करता है तो वो ही आराधना के लायक है।
                                                                                                     
वैष्णव दर्शन के अनुसार - मै ही ब्रह्मा हूँ मै ही विष्णु हूँ मै ही सब पृथ्वी ब्रह्माण्ड हूँ क्यों कि मै नहीं तो कुछ भी नहीं।


प्रकृतिवादी या बहुईश्वरवादी (ब्रह्मवादी) 

इनका मानना है कि बहुआयामी कारणों से पृथ्वी में जीवन की उत्पत्ति हुई व पृथ्वी में जीवन के पीछे कई शक्तिया विद्यमान है। किसी एक की कमी भी पृथ्वी में जीवन का विनाश कर सकती है। दर्शन के आधार पर देखे तो गणराज्य प्रकतिवादी व्यवस्था थी जिनका जिक्र वैदिक व उत्तरवैदिक साहित्य में तक्षिला गणराज्य के तौर पर सुनने को मिलता रहता है। प्रकृतिवादियों की वैचारिक संरचना में सांख्य ही एक दर्शन है जो अभी भी विद्यमान है जिसका मूल प्रकृति व पुरुष(चेतना) है। सांख्य का मानना है पुरुष प्रकृति से ही निकला है तो पुरुष प्रकृति से बाहर नहीं सोच सकता, उसके विचार प्रकृति से ही निकलते है। सांख्य को प्रकृतिवादी भी बोला जा सकता है; काफी दार्शनिक ब्रह्मा को प्रकृति व चेतना या पुरुष को सरस्वती के तौर पर भी देखते है। अन्य अद्वैत विचारो की तरह ब्रह्मा भी पूजनीय नहीं रहे होंगे। योग और आयुर्वेद की उत्पत्ति काफी इतिहासकार सांख्य से मानते हैं | जोहन्सटन, सुरेंद्रनाथ दास गुप्ता, और अन्य इतिहासकार इसे वेदों व उपनिषद से पुराना मानते हैं। उनका मानना है एकोऽद्वितीय, छन्दोगया, कथा उपनिषद, महाभारत, गीता, रामायण, स्मृतियों, पुराणों व अन्य ग्रंथो में इसे उच्च श्रेणी के ज्ञान के तौर पर माना जाता रहा है।
एक मत ये है की अशोक के शासन के दौरान सभी गैर सवर्ण ईश्वरी मतों का व ईश्वरी मतों के दर्शन ग्रंथों का विनाश कर दिया गया, व बाद में अशोक के साम्राज्य के अंत के बाद द्वैत दर्शन के साथ मिला कपिल मुनि ने इस के ज्ञान को फिर एकत्रित कर संख्या ग्रंथो की पुनः रचना की |
बहु ईश्वर (ब्रह्मा) वादियों के अनुसार - मै कि उत्पत्ति हम से हुई है हम ही मै को पहचान प्रधान करता है बिना हम के मै कि कोई पहचान नहीं | इनका मानना है कि हम एक परिवार में एक पहचान के साथ पैदा होते हैं। इस लिए परिवार या समुदाय यानि हम के बिना मै का कोई अस्तित्व नहीं है।
इनकी आर्थिक, न्यायिक व शैक्षिक व्यस्था की तुलना हम गणराज्य व्यस्था से कर सकते हैं।



[1] Hymns of the Tamil Saivite Saintsby F. Kingsbury and G.P. Phillips https://www.sacred-texts.com/hin/htss/index.htm

[5] प्राचीन भारत में राजनैतिक विचार एवं संस्थाए रामशरण शर्मा p 94

4/16/19

TSC Philosophy | हिन्दू: एक गैर राजनैतिक परिभाषा | Part 1 | Tarun Bisht

Pashupati Seal from Harappan Civilisation 


हिन्दुइस्म सिर्फ एक पंथ नहीं है। इसके पीछे पूरा का पूरा इतिहास और संस्कृति का अनन्त वितान फैला हुआ है। इसके सन्दर्भ में इतिहास की बात करें तो हमें सबसे पहले इंसानी अवशेष भारतीय उप-महादीप में करीब डेढ़ लाख साल पहले होमो-सेपियन्स और होमिनिड्स (प्रथम मानव जिसमें मानसिक चेतना पायी गई ) के मिलते है। अगर DNA टेस्ट के आधार पर दक्षिणी एशिआई जेनेटिक्स देखे तो हमें मानव आगमन के भारतीय उपमहाद्वीप में चिह्न करीब 60,000-65000 वर्ष पूर्व के मिलते हैं।[1] इस सन्दर्भ में कुछ पारिभाषिक शब्दों को समझ के ही हम आगे बढ़ सकते हैं।

भारतीय ईश्वरी मत

भारतीय ईश्वरी मत की संरचना को समझने के लिए पहले ये जान ले की भारतीय उपमहाद्वीप में हर वैचारिक संरचना एक दर्शन के तौर पर देखी जाती रही है जिस की सामाजिक व राजनैतिक व्याख्या को हम आश्रम या गोत्र के नाम से भी जानते हैं।

आश्रम व्यवस्था

वैदिक काल की शुरुआत में समिति व सभा का उल्लेख आता है [2] जिसमें स्त्रिया भी समान रूप से शामिल होती थीं।[3] वैदिक काल में हर दर्शन का कई आश्रमों द्वारा अनुसरण किया जाता था। हर आश्रम, दर्शन की अपनी व्याख्या अपने स्थानीय व राजनैतिक परिवेश के अनुसार करता था। इन आश्रमों के अधिकार में अनेक कबीले होते थे, हरेक आश्रम अपने समुदाय की जीवनशैली, विचार, आर्थिक महत्त्व व आस्थाओं को नियंत्रित करते थे। आश्रम ही दर्शन की व्याख्या व आदर्श तय करते थे। इसी के आधार पर वह न्यायिक संरचना बनती थी जिस का राजा द्वारा नागरिकों से पालन करवाया जाता था। हरेक नागरिक के कर्म के अनुसार उसका धर्म तय था। अलग अलग आश्रमों के द्वारा प्रत्येक कारीगर वर्ग, किसान ब्राहमण क्षत्रिय व्यापारी मजदूर आदि के लिए अलग अलग धर्म तय था जो उन के अधिकारों के साथ साथ जिम्मदारी भी तय करता था। धर्म के विपरीत कार्य करना या धर्म का उत्तरदायित्व न निभाना दंडनीय था। सबसे बड़ा दंड था दर्शन रहित कर देना यानि गोत्र-बाहर कर देना। यह देश निकाला भी था। आश्रमों में ब्रह्म ऋषिओं द्वारा दर्शन के अनुसार विचार कर आश्रम के अनुयायियों के लिए निर्णय लिए जाते थे। आश्रम के अंदर आने वाले राजा भी इस न्यायपालिका के फैसले को मानने से इंकार नहीं कर सकते थे। ब्रह्म ऋषि बनने के लिए जीवन चक्र के ज्ञान को पूर्ण रूप से समाज में प्रणामित करना होता था।
अलग अलग आश्रमों द्वारा युद्ध के समय एक सेनानायक चुना जाता था। गणराज्य व्यवस्था भी प्रचलित थी। मारुत को गणों का स्वामी व गणों की संख्या एक जगह 63 बताई गई है।[4] ये युद्ध के समय आश्रम के अधीन कबीलाई सेनाओं का संचालन करता थे। युद्ध में जीते गए पशुओं व लूट के माल का बंटवारा भी सेनानायक द्वारा नियंत्रित था। गोत्र रक्षा के लिए गोत्र का मनोबल ऊँचा रखने की जरुरत थी जिस के लिए युद्ध में नेतृत्व कर्ता को नायक बनाया गया; उसके हर युद्ध विजय की कथा अतिश्योक्ति में लिखी गई।
इस तरह की स्तुतिओं से वेद भरे पड़े हैं। नेतृत्व कर्ता की पूजा का प्रचलन वैदिक काल में काफी आम था। अस्तित्व के लिए नेतृत्व कर्ता ही धन, यश की रक्षा करता था । वही दुश्मनों का नाषक तो था ही, साथ में युद्ध में जीत कर लाए गए पशु धन का भी यज्ञ में सभा और समिति द्वारा वितरण किया जाता था।[5] नेतृत्व कर्ता  की पूजा स्वभाविक थी, इन सेना नायको के अलग अलग आश्रमों द्वारा अलग अलग नाम प्रचलित थे जैसे वरुण, इंद्र,अग्नि, मेरुत आदि।[6]
यदि आज के पश्चिमी रिलिजन के आधार पर कहे तो इन आश्रमों को हम रिलिजन कह सकते है जो आगे चल कर भारतीय उपमहाद्वीप में गोत्र पहचान के रूप प्रचलित हुए, जैसे पश्चमी सभ्यता में अब्राहम दर्शन से ज्यूस, क्रिस्चियन व इस्लाम आदि रिलिजन की उत्पत्ति हुई।

दर्शन

हर वैचारिक दृष्टि एक दर्शन है जिस की आधार संरचना "मै और हम" की व्याख्या से निकलता है। मैं और हम की व्याख्या के बगैर भारतीय संस्कृति में किसी भी विचार को दर्शन नहीं माना जा सकता है। भारतीय ईश्वरी मत जानने से पहले हमें दर्शन जानना जरुरी है। अगर हम दर्शन के माध्यम से देखें तो दर्शन को दो हिस्सों में बाँट सकते हैं— द्वैत (dual)— जिनका मानना है कि ईश्वर ने पूरे विश्व की रचना की और वही इस पर राज करता है, यह विचारधारा द्वैत कहलाती है। उदाहरण के लिए स्वर्ग-नर्क, अच्छा-बुरा, सत्य-असत्य, दोस्त दुश्मन। अद्वैत (Non-Dual) एक पूर्वी विचारधारा है, जिसके अनुयायी  मानते हैं कि सम्पूर्ण विश्व ही ईश्वर है; वह अच्छे-बुरे, सही-गलत से परे होता है। इनका मानना है हम प्रकृति से निकले है प्रकृति में समां जायेंगे; कोई स्वर्ग-नर्क नहीं होता, इनका मानना है हर चीज जो समय के साथ अपना रूप परिवर्तन करती है वो जीवित है; ये मत पूर्वजन्म पर भी विश्वास करता है। इन दर्शनों में ईश्वर मात्र एक विचार है जिस की वजह से ये ईश्वर को पूजने की जगह ईश्वर को जानने पर ज्यादा जोर देते हैं व गुरु पूजा भी यहाँ बहुत प्रचलित है।
ये सारे  दर्शन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अलग अलग आश्रमों व गणराज्य के माध्यम से विद्यमान थे ।
जब हम शुरुआती भारतीय दर्शन की बात करते हैं जिनके उल्लेख हमें वेदों व उपनिषदों से मिलते हैं तो हम उन्हें तीन हिस्सों में बाँटते हैं, यही तीन दर्शन बाद में सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में त्रिमूर्ति के नाम से प्रसिद्ध हुए



[2] प्राचीन भारत में राजनैतिक विचार एवं संस्थाए रामशरण शर्मा p 91
[3] प्राचीन भारत में राजनैतिक विचार एवं संस्थाए रामशरण शर्मा p 92
[4] प्राचीन भारत में राजनैतिक विचार एवं संस्थाए रामशरण शर्मा p 94
[5] प्राचीन भारत में राजनैतिक विचार एवं संस्थाए रामशरण शर्मा p 95