7/15/19

Khadijah Lacina | Five Poems

Chasing the Dragon, Roger Kohn

1.

wrapped in rain
light between
trees the soft
fragrance 
of woodsmoke
the sound

2.

damp scent of grief
caught beneath 
leaf and soil
memory
the whisper
of sand
on wood 

3.

flamelit night
throws her best
shade
our bodies
lost still
we stay
the dance

4.

skyloosed bolt
shattered oak
fire warms rain

5.

always moving toward
you forget the sandy
scrape of a cat
licking your hand
the voiceless
shush of wind
through leaf
full trees
the goldshot dark
of the backs 
of your own eyes


7/14/19

Two Poems | Nj Ladynj


August Macke Unter den Lauben in Thun 1913



Leave yourself a reminder


in the black Camry parked in the driveway
strapped, trapped, in her car seat
where temperatures can rise quickly
with the sun shining down on a 70-degree day
a 21-month old baby dies
alone
in Lakewood, NJ
abandoned by her parents
who had a “miscommunication”

no charges have been issued
no blame has been placed

““…parents should leave something in the
back seat with their child like a wallet, purse
or phone as a reminder that a child is in the
backseat.” (Thank you, Dr. Shah, you dick!)

Once
you would tie a string around your
finger to remember …or jot yourself a note

*Pick up a gallon of milk. Take out the garbage. *
*Drop off the dry cleaning. Pay the rent.*

how many times did you have to remind yourself
that there was a baby in the back seat?

who could blame the parents though?
those who live in a time when satellites
reset our electronic clocks for daylight savings;
and bells ding in our cars when our seatbelt
isn’t secured or our headlights turn off
automatically; or bills are set up for auto-pay
so we don’t get electric or gas shut-off notices
or aren’t evicted from our homes.

maybe they were waiting for a text message
reminder to tell them that their baby’s system
would overheat and she would die if no one
removed her from the hot car.
But they never thought about her.
They forgot about her.

*Forgot* about her.

“So when you get out of the car you do not forget
your kid because you have to grab your wallet,
your cell phone and any other important valuables.”

Important valuables? Ok, run the list: I got the milk, my wallet,
the dry-cleaning ticket, my cell phone, our 4-year-old daughter
who was also in the backseat in her own child seat next to the baby…
…hmmmm, anything else?

Oh, wait. This wasn’t the parents’ fault.
That’s right. It was the miscommunication between them.

How so? Oops, now we have *two* gallons of milk?
Nope. Not that.

It was a *tragic* loss of life.

It took a neighbor to find the lifeless girl,
unresponsive to EMS attempts.

I can’t help but wonder what miscommunication occurred – or how the hours
in the house together passed between husband and wife. When does one stop
and ask the other, “Where’d you put the baby?” Apparently never.

I want to know this child’s first name so it can fall off my lips in a
whisper of prayer.

*From a culmination of recent news about this tragedy leading up to the
article by News12 New Jersey, May 7, 2019, Lakewood “Authorities:
Miscommunication may have led to child being left to die inside hot
car*






While reading Andy Warhol

the dying just keep dying
the living keep on living
warm shit sits in a liquor store bag

the strong walk long on
borrowed circus stilts
head in vacuum, skull a balloon
drift from night to noon

waist-high waste and dirt
truth tastes fake

crayon plaster drip
past clown lips crooked
grin mute stitch

fingertips spit solo knock
hollow eyes tire of listening to self
letters line up on conveyor belts
waiting to spill into the tray

fill the non-page, hide in a wig.

7/1/19

TSC Translations | Robert Wood | Saubhik De Sarkar


artwork: B. Ajay Sharma

The Pelicans
The pelicans jostled
the piglet & rooster
as the clouds built up before us.

We packed our pepper grinders and ginger
and sought cover beneath towels
watching the fragile boats on the horizon.

They reminded us of celestial times
when the water was pure
and the shells not yet a midden
that buried what had become of all that gathering.

And the pelicans
kept jostling &
the rooster crowed & the piglet ran home.

পেলিকান পাখিরা

পেলিকান পাখিগুলো
শুয়োর ছানা আর মোরগটাকে গুঁতিয়ে মারছিল
ঠিক যেভাবে আমাদের সামনে মেঘেরা জড়ো হয়   

আমরা গোলমরিচ পেষার যন্ত্র আর আদার টুকরোগুলো
গুছিয়ে নিয়ে তোয়ালের নীচে ঢুকে পড়লাম
দিগন্তরেখায় পলকা নৌকোগুলো শুধু চোখে পড়ছিল  

ওরা আমাদের নক্ষত্রের দিনগুলোর কথা মনে করিয়ে দিল
জল তখনও নষ্ট হয়ে যায় নি
ঝিনুকরাও তখনও গোবরের তাল হয়ে ওঠেনি
যারা শুধু ঐ ভিড়ের সবকিছুকে চাপা দিয়ে রাখে

পেলিকান পাখিগুলো  
গুঁতোগুঁতি করেই চলল
মোরগটা চিৎকার করল আর শূয়োরের ছানাটা দৌড়ে পালালো       

We Danced

We block danced, wept happiness at new marriages
drowned lamentation in gold pots
thought of the way skipjack
schooled at right angles.

We went our own way
towards salvation.

আমরা নেচেছিলাম    

আমরা দল বেঁধে নেচেছিলাম, নতুন বিয়ের আসরে আনন্দে ফুঁপিয়েছিলাম
কান্নাগুলোকে সোনার বাসনে চুবিয়ে রেখে
স্কিপজ্যাক মাছ যেভাবে সঠিক কোণ শিখে নেয়
সেই রাস্তাটার কথা ভেবেছিলাম

আমরা নিজেদের রাস্তা ধরেই
পরিত্রাণের দিকে এগিয়ে গিয়েছিলাম






 


The Cream

In the frame of milk
the cream was cream
and the field, green as ants from the north.

We took tea
sweet, and said of memory
‘is it sweat?’

The paddies back home
caught fire; caught fire
from lightning

and the cow’s bones
were buried
in mountains of ash.

সর

দুধের শরীরের ভেতর
সর মানে সর
আর মাঠটা, উত্তর থেকে এগিয়ে আসা পিঁপড়েদের মতো সবুজ

আমরা চা মিষ্টি খেয়েছিলাম
আর স্মৃতি থেকে জিজ্ঞেস করেছিলাম
‘এটা কি ঘাম?’

ওদিকে বাড়িতে, ধানগাছে
আগুন লেগে গিয়েছিল, বাজ পড়ে
আগুন লেগেছিল ধানের ক্ষেতে

আর গরুর হাড়গুলো
চাপা পড়ে গিয়েছিল
ছাইয়ের গাদার নীচে  




We Laid

We laid the chillies out
put the haul by handful into bags,
spoke of that time
with turtles and dugongs, sea celery and rafts.

As the day mellowed, the honeyeaters sang out
and we braided a future
from stalks, knowing, once more, that
endless summer brought cold comfort.

আমরা সাজিয়ে রেখেছিলাম  

আমরা লঙ্কাগুলোকে বেছে নিয়ে
মুঠো মুঠো করে ব্যাগের ভেতর ঢুকিয়ে রেখেছিলাম,
সেই সময়টার কথা বলেছিলাম যেখানে
কচ্ছপ, ডুগং, সামুদ্রিক সেলেরি আর কাঠের ভেলারা ছিল।

দিনের আলো ফুরিয়ে যেতেই মৌটুসি পাখিরা গান শুরু করেছিল
আর আমরা ভবিষ্যতকে পাট পাট করে সাজিয়ে রেখেছিলাম
বোঁটার ওপরে, আরও একবার জেনে ফেলেছিলাম যে
অন্তহীন গ্রীষ্মই শেষ অবধি ঠাণ্ডা আদর নিয়ে আসে।


We Harvested

We harvested salt in a dream
bush
made rillettes of lamb’s tongues stand
attentive as blush on our
cheeks.


We went down into the caves
of belonging
with bushels and medals
found oil in the sandstone.


Between our thighs there was a reminder
to call
to answer the machines that made signs and voices, peppercorns amiable.


আমরা ফসল তুলেছিলাম

স্বপ্নের ভেতর আমরা নুন তুলেছিলাম ঘরে
    ঝোপগুলো  
ভেড়ার জিভ দিয়ে বানানো কিমার মতো উঁচিয়ে থাকলো
ঠিক যেভাবে নজরে পড়ে যায় লজ্জায় লাল হয়ে ওঠা
গাল

আমরা কারও নিজস্ব গুহার ভেতর
   নেমে গিয়েছিলাম
শস্য মাপার কৌটো আর মেডেলগুলো নিয়ে
   বেলেপাথরের মধ্যে খুঁজে পেয়েছিলাম তেল

আমাদের থাইয়ের মাঝখানে মনে করানোর জন্য কিছু একটা ছিল
   ডাকার জন্য
আর ঐসব মেশিনগুলোকে উত্তর দেওয়ার জন্য যারা ইশারা, গলার স্বর,
গোলমরিচের খোসাগুলোকে নরম করে দেয়   

6/29/19

TSC Philosophy | हिन्दू : एक गैर राजनैतिक परिभाषा | Part 7 | Tarun Bisht


नए घरानो का उदय


मौर्य काल की शुरुआत में बड़े राष्ट्रों (राज्यों) की व्यापर में उन्नति हुई एवं नए कारीगर घरानो का उदय हुआ, जहाँ पारिवारिक व्यापार होने से उत्पादन में कार्यकुशलता जरूर आयी पर पारिवारिक व्यापर से बाहर जाना धीरे धीरे मुश्किल होता  गया। ऐसे समय में किसी प्रशिक्षित गुरु से शिक्षा प्राप्त कर नए व्यापारिक व सामाजिक घराने में शामिल हुआ जा सकता था । ऐसे समय में सामाजिक स्तर बदलने वाला गुरु के सामाजिक स्तर में शामिल हो जाता था व शिक्षा दे कर अपने परिवार या समुदाय के लोगो को भी शामिल कर सकता था पर इस के लिए उसे गुरु के समुदाय के सामने परीक्षा देनी पड़ती थी । परीक्षा उत्तीर्ण कर एवं गुरु को गुरु दक्षिणा दे कर वो एक सामूहिक भोज के उपरान्त नए  सामाजिक स्तर में शामिल होता था। कारीगरों, कुम्हारो, सोनारो, बुनकरों  व अन्य किसी भी वर्ग या समुदाय  में शामिल होने से पहले ये सारे रिवाज जरुरी थे। उस समय के कारीगर सामाजिक तौर पर आज के इंजीनियर से कम नहीं थे। शिक्षण संस्थानों में धातु का काम व तकनीकि कारीगरी भी सिखाई जाती थी एवं धातु का काम करने वाले प्रशिक्षित कारीगरों का सामाजिक सम्मान भी बहुत था। सामरिक दृष्टि से किसी भी राष्ट्र के लिए ये समुदाय एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे । जनसामान्य में पुराने प्रतीक चिन्ह जो पूजनीय रहे थे वह ज्यादातर कबीले के नायक या आश्रमो के अध्यापक या ऋषि होते थे पर अब समाज में अलग अलग व्यापारी गणो के अलग अलग नायक थे जिन के कार्यो का उल्लेख अतिश्योक्ति में किया जाता था । इन्ही नायको ने आगे जा कर  व्यवसायिक सामुदायिक देवताओ की जगह ली। इसके साथ ही कारीगर समाज के अलावा व्यापारी, ब्राह्मण व क्षत्रिय (नौकरशाह) वर्ग का भी उदय हुआ । इस के अलावा सेवक, कलाकार  व मजदूर वर्ग को शूद्र बोला गया । नई सामाजिक वयस्था में सभी के कर्त्तव्य व अधिकार सुरक्षित थे , मगर युद्ध में शूद्र भी क्षत्रियो के साथ मिल कर लड़ते थे ।


कुछ इतिहासकारो का मानना है कि अशोक के बौद्ध पंथ अपनाते ही सभी दर्शन के मंदिरो का विनाश सम्पूर्ण राज्य में शरू हो गया । बौद्ध स्तूपों में वास्तुकला के ऐसे काफी नमूने मिले है जिन्हे देख कर ये कहा जा सकता है की जैन एवं  अन्य मंदिरो व स्तूपों को गिरा कर इन बौद्ध  स्तूपों की रचना की गईं थी। भारतीय संस्कृति में शासक को कोई एक दर्शन ग्रहण करना होता था राजा बनने के लिए वर्ना उसे तानाशाह ही माना जाता था। जहा एक ओर उसे दैवीतत्वों से जोड़ कर बताया गया , वही दूसरी ओर राजा सिद्धांतः धर्मशास्त्रों के नियमो का पालन करने को कर्तव्यबद्ध था । दर्शनो के आधार पर बने धर्मशास्त्र राजा की स्वेछाचारी प्रवित्तियों  पर अंकुश लगाते थे ।   इसे हम आज के संविधान से जोड़ कर देख सकते है ,जहा संविधान व न्यायपालिका हमारे नेतृत्वकर्ता की स्वेछाचारी प्रवित्तियों पर अंकुश लगाते है ।कोई दर्शन अपनाये बिना कोई राज्य कल्याणकारी व सभ्य राज्य नहीं कहलाता था। प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर लिखती है कि “अतीत में जोर देकर कहा गया है की मौर्य साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण अशोक की बौद्ध समर्थक नीतियां थी व उस की बौद्ध समर्थक नीतियों के चलते ब्राह्मणों का विद्रोह पर उतारू होने का आरोप लगाया है” । लेकिन अशोक की सामान्य नीति ब्राह्मण धर्म को क्षति पहुँच कर बौद्ध धर्म के सक्रिय प्रचार की नहीं थी । हर जन मानस को अपना दर्शन स्वीकार करने की या या अन्य दर्शन अस्वीकार करने की पूरी आजादी थी । वह बार बार कहता था कि ब्राहमणो  व  श्रमणो  दोनों का आदर करना चाहिए, पर समय की दृष्टि से देखे तो यह एक स्वाभाविक  स्थिति थी । अशोक का शासन जहाँ व्यापारियों के लिए एक बड़ा अवसर था, वही अशोक को दबाव बनाए रखने के लिए आलीशान इमारतों की जरुरत थी । एक मत यह भी है  कि इससे पहले इतने बड़े राष्ट्रों की उत्पत्ति भी नहीं हुई थी  जो  बड़े आलीशान भवनों व स्मारकों  का निर्माण कर सके जितने विशाल स्मारक मौर्य काल या उस के बाद बनाए गए  । जहा आश्रम व्यवस्था ‘समाज कल्याण’  पर आधारित थी वहा इस तरह कि आलीशान इमारते संभव नहीं थी । 


वही दूसरी ओर आरम्भिक पाली बौद्धग्रंथो में इन्द्र तथा ब्रह्मा को बुद्ध के उपदेशो को श्रद्धापूर्ण सुनने वालों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। महायान ने अपने देव कुल में कई सारे नए देवताओ का जिन में गणेश, शिव और विष्णु भी हैं समावेश कर लिया पर ये तमाम देवता बुद्ध के अधीनस्थ थे। ये ग्रन्थ अशोक के समय कि स्थिति को दर्शाते हैं ।आरम्भ से ही बौद्ध संघ में ब्राह्मण( विद्वान) रहे थे, और इसे एक नए आर्थिक, शैक्षिक, राजनैतिक, व वैचारिक रूप में आश्रमो व ब्राह्मणो ने स्वीकार किया ।

अशोक का राज्य यूरोप तक फैला हुआ था, मगर अशोक की प्रमुख सत्ता उत्तर भारत तक ही  सीमित रही  और अशोक की मृत्यु  के उपरांत प्रशासनिक उच्च अधिकारीयों के हाथ में शक्ति केंद्रित होती चली गई । युनानी राष्ट्र ने खुद को पुनः स्वतंत्र घोषित कर फिर पंजाब में अपना राज्य कायम किया । मौर्य साम्राज्य के डूबने का कारण भी कुछेक इतिहासकार इन स्मारकों पर होने वाला खर्चा ही बताते है । स्तूपों व स्मारकों के खर्चे से मौर्य साम्राज्य अशोक के समय ही आर्थिक रूप से काफी ख़राब स्थिति में पहुँच गया था जो मौर्य साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण बना । 

धीरे धीरे कई  सामंतो  (नौकरशाहों) ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया । ऐसे समय में अंतिम मौर्य राजा बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की व पुनः वैदिक राज्य  की स्थापना की।   इसमें चाणक्य का अर्थशास्त्र लागू न हो कर वैदिक कर नीति लागु थी । समाज ने दर्शन हेतु वैदिक दर्शन को अपनाया व वैदिक रीतिरिवाजों का भी अनुसरण फिर से शुरू हुआ । ये वैदिक राज्य करीब 112 वर्ष चला ।  

चाणक्य की यह  व्यवस्था आर्थिक और प्रशासनिक तौर पर हर जगह लागू नहीं थी या ये कहें कि ये व्यवस्था इसी रूप में फिर कभी कहीं और लागु हुई हो ऐसे उल्लेख नहीं मिलते, पर ऐतिहासिक दृष्टि से इसे कभी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। पर चाणक्य के अलावा सातवाहन राज्य में जो कि मातृवंशावली राज्य था वहां की अर्थव्यस्था व प्रशासन व्यवस्था चाणक्य वयस्था से भिन्न मिलती है ।
 
बाद में गुप्त वंश ने भी वैदिक दर्शन के आधार पर वैदिक आर्थिक निति को अपनाया, मगर इस दौर में वैदिक शासन में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलता है जिस में वैदिक पुराने तीन दर्शनों के अलावा  जैन ,बौद्ध व अन्य दर्शनों को भी वैदिक दर्शनों में जगह मिली ।  इस नए दृष्टिकोण का उल्लेख हमें  स्यादवाद में भी मिलता है

स्यादवाद

किसी भी वस्तु को समझने के लिए विभिन्न दृष्टिकोण हैं। इनका मानना है की किसी एक दृष्टि से सत्य को सिर्फ एक तरफ़ा तरीके से ही देखा जा सकता है पर ये सत्य निरपेक्ष नहीं होगा। सापेक्ष या एक दर्शन सम्बन्धित सत्य की प्राप्ति के कारण ही किसी भी वास्तु के सम्बद्ध में साधारण व्यक्ति का निर्णय सभी दृष्टियों से सत्य नहीं हो सकता । लोगो के बीच भेदभाव का कारण यही है कि वह अपने विचारो को अचल सत्य मानने लगते है और दूसरे के विचारो की उपेक्षा करते है। इस लिए अनेकतावाद जरुरी है जहाँ भिन्न दर्शनों के माध्यम से देखने से सत्य और वास्तिवकता अलग अलग समझ में आती है अन्यथा एक ही दृष्टि से देखने से पूर्ण सत्य की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती। 

सम्पूर्ण उत्तर भारत में अनेको छोटे छोटे सामंत राज स्थापित  हुए । ऐसे ही एक सामंत श्रीगुप्त व उस के पुत्र  घटोत्कच ने उत्तर भारत के सामंतो को जीतते हुए गुप्त वंश की नीव रखी पर इन दोनों ने ही महाराजा की उपाधि धारण की ।  उस समय में  महाराजा की उपाधि सामंतो को दी जाती थी । ये विवरण प्राप्त नहीं कि ये किस की शासन वयस्था में सामंत थे।  चन्द्रगुप्त गुप्त साम्राज्य के पहले शासक बने ।

ये राज्य वैदिक गोत्र गठबंधन के साथ साथ नए गोत्र गठबंधन को स्वीकार कर बना था । चाणक्य व्यवस्था के मुकाबले वैदिक सामंतवादी व्यवस्था में लोगो पर करो का बोझ  बहुत कम था, जिसकी वजह नई सामंती निति थी जिस ने प्रशासन कर्मचारियों की संख्या भी कम कर दी थी जिस से राज्य को नकद वतन देने का बोझ कम रहता था।

गुप्त काल में वेतन के रूप में सामंतो को ज़मीन का टुकड़ा दिया जाने लगा । ये सामंतवाद की दूसरी स्थिति थी ।पर कर रहित ज़मीन दान ब्राह्मण  (विद्वानों) व बौद्ध भिक्षुओं को मिलने के भी कई प्रमाण मिले है । इन्हे देख कर ये अनुमान होता है कि विश्वविद्यालयों के अलावा शोध के लिए भी ज़मीन के कर रहित  टुकड़े राजा द्वारा अनुदान में दिए जाते थे ।

6/20/19

Fiction | Short Story | Cusp | Preeti Nangal



Cusp
(Trigger Warning: Sexual Violence)

It was the second day.

They unlocked the door and stepped in. The room had no furniture and the only window was barred with planks of wood obstructing every grain of light. A finger flicked a switch and the muck covered bulb filled the room with an arrogant flash.

A woman was lying in the corner. Spending the entire day in the dark, this was an unwelcome intrusion. The light hurt her eyes. She recoiled and covered her face with her hands. The three men encircled her ravaged body as one of them pulled her by her arm like an overused rag doll. She was in a trance of pain. The darkness had exhausted her and she had no will left to resist.

Throwing the empty bottle of alcohol aside, one of the men bent down and started groping her body when a young boy rushed in.

“Here,” he said in a frail tone, handing another chilled bottle to one of the other men, and looked down. The man who crouched beside him, with white and grey hair, was his uncle. He was past his middle age but the lust seemed unquenchable.

The boy felt nauseated but he dared not show his disgust lest he would be homeless again after a few nights of shelter.

With one corner of the room drowned in groans, the boy sat in another corner trying to maintain his distance from the scene. He tried to keep his eyes off it but it did not help; the recurrent image from his past flashed again and again in his young memory, causing him pain like pointy spikes pressing against his body. He did not remember whether it was day or night; it did not even matter. What mattered was the movement.

His father lay like an animal between his mother’s legs riding her like a wild dog; just like the men in front of his eyes. He did not know what was happening then. He had barely learnt to hold the stub of a pencil in his hand. But the manner in which his mother’s saree was pulled up and her blouse was stripped open, he felt something was not right.

As he grew up, his aversion towards his father also grew strong and he thought, more than once, of throwing his chappals at him but he never dared. His father was a masculine man with a heavy body and dark beard. He could beat anyone till they died, the boy grew up thinking.

Since he left home six years back, every man the boy lived with wanted to sleep with a woman every day. He could not understand why, and it had not been long since he could. 

As his body was changing, he was becoming used to a certain kind of smell.

He was never proud of his body. Girls would look through him if at all he managed to meet their eyes. His father called him a bastard who could not imagine to have spawned a son so lanky with skin like tattered blanket. With each passing day, the boy could sense that the reason for which he hated his father was the reason for which he could almost worship him.

The boy’s eyes fell on the men in the room. The circle seemed to have reached its completion as his uncle was about to bend again; but just before he did, he stopped, mid-way, and looked at his nephew. As soon as their eyes met, the loner was summoned with a nod. After some hesitation, the young boy lifted his body, and in his manner of awkward walking, stepped up to the scene.

The corner smelt of something familiar. He saw patches of blood on the floor and a trail of it still dripping from the woman’s body. He had seen her yesterday and realised that today she was less alive.

“Your turn,” his uncle said. The boy looked at him, and looked on. He knew what his uncle meant.

The boy looked down again and felt himself going numb. That is when his uncle patted on his back and suggested that nothing could go wrong. Having stood frozen for a second, as if deciding which spikes needed to remain in his memory and which ones thwarted, the boy bent down, opening the button of his loose jeans.

All that while he thrusted himself, the only image he had on his mind was of his father lying on top of his mother. He had coveted a body like his father’s for long where a mere look at one’s physique could induce both fear and awe but he could not attain it. He had failed; he was weak and a woman, his mates said.

In an attempt to prove them wrong, he held the throat of the woman pinned under him like his vendetta was directed at someone else. He held the frail neck tighter with each passing moment and let it go only when he could hold it no longer, under the spell of shivers that made his body convulse.

As he lay lost in the ecstasy, and the woman lay immobile, the three men looked on with their mouths agape.